
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 की तारीख़ों का बिगुल बज चुका है और मैदान में उतरने को सभी तैयार हैं। लेकिन असली “धमाका” तो तब हुआ जब खबर आई कि तेजस्वी यादव, राघोपुर के साथ-साथ मधुबनी जिले की फुलपरास सीट से भी चुनाव लड़ सकते हैं।
अब सवाल ये है— एक सीट जीतने की गारंटी नहीं, तो दो क्यों? क्या राजनीति में अब “बैकअप प्लान” जरूरी हो गया है?
राघोपुर: यादव परिवार की विरासत या डूबता हुआ जहाज?
राघोपुर यानी यादव परिवार का अभेद्य किला। लालू प्रसाद यादव से लेकर राबड़ी देवी और फिर तेजस्वी यादव तक — यही सीट उनका ‘घरेलू मैदान’ रही है।
लेकिन 2025 में खेल थोड़ा अलग है। बाढ़, बेरोजगारी, टूटी सड़कें और टूटी उम्मीदें — ये सब कुछ अब राघोपुर के मतदाताओं के मन में ‘राजद’ के लिए जगह नहीं बचने दे रहे। ऐसे में जनता पूछ रही है:
“20 साल से राज किया, अब भी विकास वेंटिलेटर पर क्यों?”
फुलपरास: नई सीट या सियासी सेफ्टी नेट?
तेजस्वी यादव का नाम अब फुलपरास विधानसभा क्षेत्र से भी जुड़ने लगा है। राजद के आंतरिक सूत्रों का कहना है कि अगर राघोपुर में “हवा उल्टी” चल रही है, तो फुलपरास से “कुर्सी बचाई” जा सकती है।
यानी अब राजनीति में भी “Cloud Backup” ट्रेंड में है।
प्रशांत किशोर का तीर: “आपको अपनी जनता पर भरोसा नहीं!”
जन सुराज पार्टी के नेता प्रशांत किशोर (PK) तेजस्वी यादव की रणनीति पर सीधा हमला करते हुए बोले:
“अगर राघोपुर की जनता के लिए काम किया होता, तो आज दूसरी सीट की ज़रूरत नहीं पड़ती।”
और आगे जोड़ दिया:

“हम भले ही चुनाव न लड़ें, लेकिन जनता के साथ मैदान में खड़े हैं। राघोपुर को बदलाव चाहिए, ब्रांड नहीं।”
क्या RJD डर गई है?
अगर तेजस्वी राघोपुर में हारते हैं तो यह केवल सीट की हार नहीं, बल्कि राजनीतिक साख की हार होगी। यादव वोट बैंक में दरार, बाढ़ क्षेत्र में आधार टूटा, जनता में विकास की मांग और PK की जनसंवाद यात्राएं।
इन सबका असर राजद के आत्मविश्वास पर दिखने लगा है। इसलिए अब फुलपरास को लेकर शोर मच रहा है।
“अगर हारने का डर है, तो क्यों न दो सीटें पकड़ें?”
सियासत का गणित आजकल JEE से भी मुश्किल हो गया है। नेता सोचते हैं:
राघोपुर = पारंपरिक वोट + परिवार का नाम
फुलपरास = नया वोट बैंक + इमेज रीब्रांडिंग
“अगर एक सीट डूबे, तो दूसरी से नाव किनारे लग जाए।”
क्या तेजस्वी का ‘डबल सीट दांव’ मास्टरस्ट्रोक होगा या पैनिक मोड?
2025 का चुनाव तेजस्वी यादव के लिए सिर्फ चुनाव नहीं, राजनीतिक परीक्षा है — जिसमें एक तरफ परिवार की विरासत है, दूसरी ओर जनता का गुस्सा। और इन दोनों के बीच PK की ‘नॉन-पॉलिटिकल राजनीति’ भी खड़ी है।
अब देखना है, तेजस्वी यादव चुनाव जीतते हैं या राघोपुर की जनता ‘पासवर्ड’ बदल चुकी है!
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